1 श्रद्धांजलि गौरीशंकर मंदिर के पुजारी स्व. जयराम शर्मा जी की धर्मपत्नी श्रीमती रामकली शर्मा का निधन श्रद्धांजलि और जीवन परिचय

1 श्रद्धांजलि गौरीशंकर मंदिर के पुजारी स्व. जयराम शर्मा जी की धर्मपत्नी, श्रद्धेय श्रीमती रामकली शर्मा का निधन

धार्मिक आस्था, सेवा और सरलता से भरे जीवन की एक शांत लेकिन गहरी यात्रा का विराम तब होता है, जब कोई पूजनीय व्यक्तित्व इस संसार से विदा होता है। गौरीशंकर मंदिर के पुजारी स्व. जयराम शर्मा जी की धर्मपत्नी, श्रद्धेय श्रीमती रामकली शर्मा का हालिया निधन न केवल उनके परिवार, बल्कि पूरे क्षेत्र के श्रद्धालुओं और समाज के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनका जीवन त्याग, सेवा, संस्कार और करुणा का जीवंत उदाहरण रहा।


श्रीमती रामकली शर्मा : जीवन का संक्षिप्त परिचय

श्रीमती रामकली शर्मा एक सुसंस्कृत, धार्मिक और पारंपरिक भारतीय गृहिणी थीं, जिनका पूरा जीवन परिवार, समाज और धर्म के प्रति समर्पण में व्यतीत हुआ। वे एक पुजारी परिवार की आधारशिला थीं—जहाँ दिनचर्या पूजा-पाठ, अतिथि-सत्कार और समाज-सेवा से जुड़ी रहती है। उनके स्वभाव में विनम्रता, धैर्य और करुणा सहज रूप से विद्यमान थी।

 नगर की सुप्रसिद्ध गौरीशंकर मंदिर के पुजारी स्व.जयराम शर्मा जी की धर्मपत्नी श्रीमती रामकली शर्मा का आज 88 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे पत्रकार महेश शर्मा, स्व.दिनेश शर्मा और स्व. राजेश शर्मा (ज्ञानी) की माताश्री थी। वे अरविंद कुमार शर्मा (LIC) की ताई और स्वामी शर्मा व वैभव शर्मा (जॉनी) की दादी थी। उनकी अंतिम यात्रा आज दोपहर 3 बजे उनके मंदिर चौक स्थित निवास स्थान से निकाली जायेगी। कयाघाट मुक्तिधाम में उनका अंतिम संस्कार होगा..ॐ शांति।


पुजारी परिवार की परंपरा और गृहस्थी की भूमिका

पुजारी परिवारों में गृहस्थी केवल घरेलू दायित्वों तक सीमित नहीं रहती। मंदिर की दिनचर्या, व्रत-त्योहारों की तैयारी, प्रसाद व्यवस्था, श्रद्धालुओं के लिए भोजन और ठहराव—इन सबमें गृहिणी की भूमिका केंद्रीय होती है। श्रीमती रामकली शर्मा ने वर्षों तक इस जिम्मेदारी को निष्ठा से निभाया।
उनका मानना था कि सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। यही कारण है कि मंदिर में आने वाले श्रद्धालु उन्हें स्नेह से स्मरण करते हैं।


धार्मिक आस्था और संस्कार

श्रीमती रामकली शर्मा का जीवन धर्मपरायणता का प्रतिबिंब था। वे नियमित पूजा, व्रत और धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता करती थीं। सावन, महाशिवरात्रि, नवरात्रि, कार्तिक मास, एकादशी—इन अवसरों पर उनकी सक्रियता परिवार और समाज के लिए प्रेरक रही।
उनकी आस्था केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं थी; वह करुणा, संयम और सदाचार के रूप में उनके व्यवहार में झलकती थी।

श्रीमती रामकली शर्मा का संपूर्ण जीवन धार्मिक आस्था, सनातन परंपराओं और श्रेष्ठ संस्कारों से ओतप्रोत रहा। वे केवल एक पुजारी की धर्मपत्नी ही नहीं थीं, बल्कि स्वयं में एक जीवंत धार्मिक व्यक्तित्व थीं, जिनके आचरण में धर्म दिखाई देता था। उनका विश्वास था कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि दैनिक जीवन के प्रत्येक कर्म में परिलक्षित होना चाहिए

वे प्रातःकाल उठकर स्नान-ध्यान के पश्चात नियमित रूप से ईश्वर का स्मरण करती थीं। घर में दीप-धूप, मंत्रोच्चार और शांति का वातावरण उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा था। गौरीशंकर मंदिर से उनका गहरा आत्मिक जुड़ाव था। मंदिर की पूजा व्यवस्था, व्रत-त्योहारों की तैयारी और धार्मिक अनुष्ठानों में वे सदैव सक्रिय भूमिका निभाती थीं।

व्रत, पर्व और परंपराएं

श्रीमती रामकली शर्मा सावन मास, महाशिवरात्रि, नवरात्रि, एकादशी, हरियाली तीज, करवा चौथ जैसे प्रमुख व्रत-पर्व पूरी श्रद्धा और नियम से करती थीं। व्रत उनके लिए केवल परंपरा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और संयम का साधन थे। वे परिवार के सदस्यों को भी व्रतों का आध्यात्मिक महत्व समझाती थीं, जिससे नई पीढ़ी में धार्मिक चेतना बनी रहे।Kelo Pravah

संस्कारों का संवहन

उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष था संस्कारों का संचार। उन्होंने अपने बच्चों और परिवार को सिखाया कि—

  • बड़ों का सम्मान

  • अतिथि को देवतुल्य मानना

  • सत्य, संयम और करुणा का पालन

  • धर्म के साथ-साथ मानवीय मूल्यों का आदर

वे मानती थीं कि यदि घर के भीतर संस्कार मजबूत हों, तो समाज स्वतः ही सशक्त बनता है। उनका व्यवहार सरल, वाणी मधुर और दृष्टि करुणामयी थी।

सेवा ही सच्चा धर्म

श्रीमती रामकली शर्मा के लिए सेवा ही सबसे बड़ा धर्म थी। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की सहायता करना, प्रसाद वितरण में सहयोग, जरूरतमंदों को भोजन कराना और दुखी लोगों को सांत्वना देना—ये सब उनके स्वभाव का हिस्सा था। वे बिना किसी अपेक्षा के सेवा करती थीं, क्योंकि उनका विश्वास था कि निस्वार्थ कर्म ही ईश्वर की सच्ची पूजा है

धार्मिक जीवन का प्रभाव

उनकी धार्मिक आस्था ने न केवल उनके परिवार को, बल्कि पूरे समाज को प्रभावित किया। लोग उन्हें एक ऐसी महिला के रूप में याद करते हैं, जिनकी उपस्थिति से ही सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता था। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि संस्कार और श्रद्धा यदि जीवन में उतर जाएं, तो व्यक्ति स्वयं एक चलती-फिरती प्रेरणा बन जाता है

श्रीमती रामकली शर्मा की धार्मिक निष्ठा और संस्कार आज भी लोगों के लिए मार्गदर्शन का स्रोत हैं और आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाते रहेंगे कि सच्चा धर्म आडंबर में नहीं, बल्कि आचरण में होता है।


सामाजिक योगदान और मानवीय संवेदना

वे समाज के सुख-दुख में सहभागी रहती थीं। किसी घर में शोक हो या उल्लास—उनकी उपस्थिति सदा सांत्वना और सौहार्द का भाव लेकर आती थी। जरूरतमंदों की सहायता, बेटियों के विवाह में सहयोग, बीमारों के लिए दुआ—ये सब उनके स्वभाव का अभिन्न हिस्सा थे।


परिवार के प्रति समर्पण

परिवार के लिए वे मार्गदर्शक थीं। बच्चों को संस्कार, बड़ों को सम्मान और पड़ोसियों को अपनापन—यह उनके जीवन का सूत्र था। उन्होंने अगली पीढ़ी को धर्म, परिश्रम और विनम्रता के मूल्य सिखाए।
उनका सादा जीवन और उच्च विचार परिवार के लिए स्थायी प्रेरणा बने रहेंगे।

Amar Ujala


गौरीशंकर मंदिर से आत्मीय संबंध

गौरीशंकर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि उनकी साधना का केंद्र था। मंदिर की स्वच्छता, पूजा-सामग्री की व्यवस्था, व्रत-उपवास के दिन विशेष तैयारी—इन सबमें उनका योगदान अविस्मरणीय रहा।
श्रद्धालुओं के साथ उनका संवाद स्नेहपूर्ण रहता, जिससे मंदिर का वातावरण और भी पवित्र बनता था।


जीवन दर्शन : सादगी और सेवा

उनका जीवन संदेश देता है कि सादगी में भी महानता होती है। बिना किसी दिखावे के, उन्होंने सेवा और सदाचार को अपनाया। उनका व्यवहार बताता था कि धर्म केवल पूजा में नहीं, बल्कि मानवीय व्यवहार में भी प्रकट होता है।


अंतिम समय और समाज की प्रतिक्रिया

उनके निधन का समाचार फैलते ही पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। श्रद्धालु, पड़ोसी और परिचित शोक-संतप्त परिवार के साथ खड़े नजर आए। अंतिम दर्शन के समय लोगों की आंखें नम थीं—यह उनके प्रति सम्मान और प्रेम का प्रमाण है।


अंतिम संस्कार और धार्मिक परंपराएं

हिंदू परंपराओं के अनुरूप उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार, पारिवारिक शोक और समाज की सहभागिता—सब कुछ अत्यंत गरिमामय रहा। यह विदाई उनके धर्मनिष्ठ जीवन के अनुरूप थी।

अंतिम यात्रा से पूर्व पार्थिव शरीर को स्नान कराकर स्वच्छ वस्त्र धारण कराए गए। माथे पर चंदन, तुलसी दल और पुष्प अर्पित किए गए। पूरे वातावरण में “राम नाम सत्य है” और वैदिक मंत्रों का गूंजता स्वर सुनाई दे रहा था, जो आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना का प्रतीक माना जाता है।

चूँकि वे गौरीशंकर मंदिर के पुजारी परिवार से जुड़ी थीं, इसलिए अंतिम संस्कार में धार्मिक मर्यादाओं का विशेष ध्यान रखा गया। परिवार के वरिष्ठ सदस्यों और आचार्यों द्वारा विधि-विधान से संकल्प कराया गया तथा अग्नि संस्कार से पूर्व वैदिक मंत्रों के माध्यम से ईश्वर से दिवंगत आत्मा की सद्गति की प्रार्थना की गई।

मुखाग्नि का दायित्व परंपरा अनुसार परिजनों द्वारा निभाया गया। अग्नि को साक्षी मानकर जीवन की नश्वरता और आत्मा की अमरता का स्मरण किया गया। यह संस्कार इस विश्वास को दर्शाता है कि शरीर पंचतत्वों में विलीन होता है, जबकि आत्मा अपनी आगे की यात्रा पर अग्रसर होती है।

अंतिम संस्कार के उपरांत परिवार द्वारा पिंडदान, तेरहवीं संस्कार और शांति पाठ की तैयारी की गई। इन अनुष्ठानों का उद्देश्य दिवंगत आत्मा की शांति, पितृलोक में स्थान और परिवार पर आए दुःख से मुक्ति की कामना करना होता है। शांति पाठ के दौरान वेद मंत्रों, श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों और शिव स्तोत्रों का पाठ किया गया, जिससे वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया।

समाज के अनेक श्रद्धालु, पड़ोसी और परिचितजन अंतिम संस्कार में उपस्थित रहे। सभी ने शोक-संतप्त परिवार को ढांढस बंधाया और दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की। यह सहभागिता इस बात का प्रमाण थी कि श्रीमती रामकली शर्मा न केवल एक परिवार की सदस्य थीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक आदरणीय और स्नेहिल व्यक्तित्व थीं। The Times of India


शोक संदेश और श्रद्धांजलि

समाज के विभिन्न वर्गों, मंदिर समिति और श्रद्धालुओं ने गहरी संवेदना व्यक्त की। सभी ने एक स्वर में कहा कि श्रीमती रामकली शर्मा का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत रहेगा।


स्मृतियाँ जो अमर रहेंगी

व्यक्ति चला जाता है, पर उसकी स्मृतियाँ रह जाती हैं। श्रीमती रामकली शर्मा की मुस्कान, सेवा-भाव, और सरलता—ये सब हमेशा लोगों के हृदय में जीवित रहेंगी। उनके द्वारा बोए गए संस्कार भविष्य में भी समाज को दिशा देंगे।


समाज के लिए सीख

उनका जीवन हमें सिखाता है—

  • परिवार और समाज दोनों के प्रति संतुलन

  • धर्म को व्यवहार में उतारना

  • सेवा और करुणा को जीवन का आधार बनाना

श्रीमती रामकली शर्मा का निधन एक युगांत है—एक ऐसे जीवन का, जो बिना शोर किए, चुपचाप सेवा करता रहा। रायगढ़ की धार्मिक और सामाजिक चेतना में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और शोकाकुल परिवार को यह दुःख सहन करने की शक्ति दें।

ॐ शांति।

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